एक अंग्रेजी भाषी व्यक्ति जब पहली बार कंप्यूटर के सामने बैठता है, तो उसे कोई नया कीबोर्ड नहीं सीखना पड़ता। जो QWERTY कीबोर्ड उसके मोबाइल पर था, वही उसके लैपटॉप पर है। लेकिन एक हिंदी भाषी व्यक्ति जब डिजिटल दुनिया में कदम रखता है, तो उसका सामना एक बहुत बड़े चक्रव्यूह से होता है।
वह फ़ोन पर लिखता है "Mera Bharat Mahan" और स्क्रीन पर बन जाता है "मेरा भारत महान"। लेकिन जब वह किसी सरकारी नौकरी की परीक्षा (SSC, High Court, CPCT) देने जाता है, तो उससे कहा जाता है: "यहाँ फ़ोनेटिक नहीं चलेगा, इनस्क्रिप्ट या रेमिंगटन में 35 शब्द प्रति मिनट टाइप करके दिखाओ!"
आखिर करोड़ों हिंदी भाषी लोग टाइपिंग के इस त्रिकोणीय संघर्ष में क्यों फँसे हैं? आइए इसे गहराई से समझें।
1. तीन अलग-अलग दुनियाएँ: टाइपिंग के 3 मुख्य तंत्र
- 1. फ़ोनेटिक / लिप्यंतरण (Phonetic Transliteration): यह स्मार्टफ़ोन की देन है। अंग्रेजी अक्षरों से हिंदी ध्वनियाँ लिखना (जैसे "namaste" = "नमस्ते")। यह आम लोगों के लिए बहुत आसान है, लेकिन लंबे पेशेवर दस्तावेज़ों और जटिल संयुक्त अक्षरों के लिए बहुत धीमा और कभी-कभी अशुद्ध साबित होता है।
- 2. इनस्क्रिप्ट (InScript - Indian Script): भारत सरकार और सी-डैक (C-DAC) द्वारा तैयार किया गया राष्ट्रीय मानक लेआउट। यह पूरी तरह वैज्ञानिक है — इसमें बाएँ हाथ पर सभी स्वर (अ, आ, इ, ई) और दाएँ हाथ पर सभी व्यंजन (क, ख, ग, घ) देवनागरी वर्णमाला के क्रम में व्यवस्थित हैं। एक बार सीखने के बाद इसमें 50-60 शब्द प्रति मिनट की गति बहुत आसानी से हासिल की जा सकती है।
- 3. रेमिंगटन (Remington Gail / CBI): 100 साल पुराने मैकेनिकल टाइपराइटर का भूत जो आज भी हमारे दफ्तरों का पीछा नहीं छोड़ रहा। इसमें अक्षरों को लाने के लिए अजीबोगरीब कोड और शिफ्ट कुंजियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है।
2. "संज्ञानात्मक खाई" (The Cognitive Gap): समस्या कहाँ है?
समस्या यह है कि हमारे देश में डिजिटल साक्षरता और सरकारी परीक्षा प्रणाली के बीच कोई तालमेल नहीं है:
- बाज़ार में हिंदी कीबोर्ड का न मिलना: भारत में बिकने वाले 99% कीबोर्ड्स पर केवल अंग्रेजी के अक्षर छपे होते हैं। एक नया सीखने वाला छात्र जब इनस्क्रिप्ट सीखना चाहता है, तो उसे कीबोर्ड पर कोई देवनागरी अक्षर दिखाई ही नहीं देता! उसे स्क्रीन पर चार्ट देखकर अंदाज़े से उँगलियाँ चलानी पड़ती हैं।
- संस्थानों की हठधर्मिता: बहुत से राज्य आयोग आज भी पुराने कृतिदेव और रेमिंगटन लेआउट की माँग करते हैं। छात्र परीक्षा पास करने के लिए महीनों रेमिंगटन सीखते हैं, और फिर नौकरी में आने के बाद उन्हें पता चलता है कि आधुनिक विंडोज़ तो यूनिकोड इनस्क्रिप्ट पर चलती है!
यदि आप सरकारी परीक्षाओं या निजी अभ्यास के लिए अपनी गति मापना चाहते हैं, तो हमारे ऑनलाइन हिंदी टाइपिंग टेस्ट (Hindi Typing Test) पर इनस्क्रिप्ट और रेमिंगटन दोनों लेआउट्स पर लाइव स्पीड व एक्यूरेसी माप सकते हैं।
3. इस द्वंद्व का स्थायी समाधान क्या है?
यदि हमें अगली पीढ़ी के करोड़ों युवाओं को हिंदी में डिजिटल रूप से सक्षम बनाना है, तो तीन कदम उठाने अनिवार्य हैं:
- स्कूलों और कंप्यूटरों में डुअल-प्रिंटेड कीबोर्ड: सरकार को यह नीतिगत निर्णय लेना चाहिए कि भारत में बिकने वाले हर लैपटॉप और कीबोर्ड पर अंग्रेजी के साथ-साथ इनस्क्रिप्ट देवनागरी अक्षर भी लेज़र-प्रिंटेड हों।
- एक देश, एक मानक लेआउट (InScript): सभी भर्ती बोर्डों (SSC, UPSC, Courts) को रेमिंगटन जैसे पुराने टाइपराइटर लेआउट्स को पूरी तरह समाप्त करके केवल इनस्क्रिप्ट को ही एकमात्र राष्ट्रीय मानक घोषित करना चाहिए।
- आधुनिक इंटरएक्टिव ट्यूटर: गेम और इंटरएक्टिव सॉफ़्टवेयर के ज़रिये छात्रों को फ़ोनेटिक से इनस्क्रिप्ट की ओर आसानी से शिफ्ट किया जाए।